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Bihar News: भ्रष्टाचार पर कार्रवाई के बाद भी अधिकारियों को मिल रही फील्ड पोस्टिंग, व्यवस्था पर उठ रहे सवाल

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बिहार में भ्रष्टाचार के आरोपों में घिरे अधिकारियों को कार्रवाई के कुछ समय बाद दोबारा फील्ड पोस्टिंग मिलने को लेकर सवाल उठ रहे हैं। ईओयू की ताजा कार्रवाई के बाद व्यवस्था पर बहस तेज हो गई है।

पटना/आलम की खबर:बिहार में भ्रष्टाचार के खिलाफ कार्रवाई और उसके बाद अधिकारियों को दोबारा प्रभावशाली पदों पर तैनाती देने की व्यवस्था एक बार फिर चर्चा में है। आर्थिक अपराध इकाई (ईओयू) की हालिया कार्रवाई के बाद राज्य की प्रशासनिक व्यवस्था और सरकार की कार्यशैली पर सवाल उठने लगे हैं। शनिवार को एक कार्यपालक अभियंता के कई ठिकानों पर हुई छापेमारी में करोड़ों रुपये की संपत्ति और भारी मात्रा में नकदी मिलने का दावा किया गया। कार्रवाई के बाद पूरे राज्य में इस मामले की चर्चा तेज हो गई, लेकिन इसके साथ ही एक पुराना सवाल भी फिर सामने आ गया कि आखिर भ्रष्टाचार के गंभीर आरोप झेल रहे अधिकारियों को कुछ समय बाद दोबारा फील्ड पोस्टिंग कैसे मिल जाती है?

राज्य में लंबे समय से यह आरोप लगता रहा है कि भ्रष्टाचार के मामलों में कार्रवाई तो होती है, लेकिन उसका असर ज्यादा दिनों तक दिखाई नहीं देता। किसी अधिकारी के खिलाफ छापेमारी होती है, जांच एजेंसियां आय से अधिक संपत्ति का मामला दर्ज करती हैं, सरकार की ओर से सस्पेंशन की कार्रवाई होती है, लेकिन कुछ समय बाद वही अधिकारी फिर किसी महत्वपूर्ण पद पर नजर आने लगते हैं। यही वजह है कि अब प्रशासनिक व्यवस्था की पारदर्शिता और जवाबदेही पर बहस तेज हो गई है।

आर्थिक अपराध इकाई की ताजा कार्रवाई के बाद राजनीतिक गलियारों से लेकर आम लोगों के बीच भी चर्चा है कि आखिर कार्रवाई का वास्तविक उद्देश्य क्या है। लोगों का कहना है कि अगर किसी अधिकारी के खिलाफ करोड़ों की अवैध संपत्ति मिलने का दावा किया जाता है, तो फिर जांच पूरी होने से पहले ही उसे दोबारा जिम्मेदार पद कैसे सौंप दिया जाता है। आम जनता इसे भ्रष्टाचार के खिलाफ लड़ाई की कमजोरी के रूप में देख रही है।

बिहार में पिछले कुछ वर्षों के दौरान कई ऐसे मामले सामने आए हैं, जिनमें भ्रष्टाचार के आरोपों में घिरे अधिकारियों पर जांच एजेंसियों ने बड़ी कार्रवाई की। कई जगहों पर छापेमारी में नकदी, जमीन, निवेश और महंगी संपत्तियों का खुलासा हुआ। लेकिन बाद में उन्हीं अधिकारियों की वापसी ने पूरे सिस्टम को लेकर सवाल खड़े कर दिए। प्रशासनिक हलकों में भी यह चर्चा होती रही है कि प्रभावशाली अधिकारियों को राजनीतिक और विभागीय संरक्षण मिल जाता है, जिसके कारण वे फिर से महत्वपूर्ण जिम्मेदारियां हासिल कर लेते हैं।

राज्य की राजनीति में सत्ता परिवर्तन के बाद अब भ्रष्टाचार को लेकर नए दावे किए जा रहे हैं। मुख्यमंत्री सम्राट चौधरी ने साफ कहा है कि भ्रष्टाचार के मामलों में किसी तरह का समझौता नहीं किया जाएगा। उन्होंने जांच एजेंसियों को स्वतंत्र रूप से कार्रवाई करने की छूट देने की बात भी कही है। सरकार का दावा है कि भ्रष्टाचार में शामिल अधिकारियों के खिलाफ कठोर कार्रवाई की जाएगी और प्रशासनिक व्यवस्था को पारदर्शी बनाया जाएगा।

हालांकि विपक्ष और कई सामाजिक संगठनों का कहना है कि केवल छापेमारी और बयानबाजी से भ्रष्टाचार पर नियंत्रण संभव नहीं है। उनका तर्क है कि जब तक भ्रष्टाचार के आरोपियों को दोबारा प्रभावशाली पदों पर भेजने की परंपरा बंद नहीं होगी, तब तक सिस्टम में सुधार की उम्मीद अधूरी रहेगी। कई लोग यह भी मानते हैं कि भ्रष्ट अधिकारियों को फील्ड पोस्टिंग देने से सरकारी कर्मचारियों के बीच गलत संदेश जाता है और ईमानदारी से काम करने वाले अधिकारियों का मनोबल प्रभावित होता है।

पिछले वर्षों में जेल प्रशासन, निर्माण विभाग और कई अन्य सरकारी विभागों से जुड़े अधिकारियों के खिलाफ आर्थिक अपराध इकाई और निगरानी एजेंसियों ने कार्रवाई की थी। कई मामलों में करोड़ों की संपत्ति मिलने का दावा किया गया, लेकिन समय बीतने के साथ वही अधिकारी फिर सरकारी जिम्मेदारियों में दिखाई देने लगे। इससे आम लोगों के बीच यह धारणा मजबूत हुई कि भ्रष्टाचार के मामलों में कार्रवाई केवल औपचारिकता बनकर रह जाती है।

विशेषज्ञों का मानना है कि भ्रष्टाचार के खिलाफ प्रभावी लड़ाई के लिए केवल छापेमारी या निलंबन पर्याप्त नहीं है। जरूरी यह है कि जांच प्रक्रिया तेज और निष्पक्ष हो, दोषी अधिकारियों पर समयबद्ध कार्रवाई हो और जब तक उन्हें क्लीन चिट न मिले तब तक संवेदनशील पदों से दूर रखा जाए। प्रशासनिक सुधारों के बिना भ्रष्टाचार पर स्थायी नियंत्रण मुश्किल माना जा रहा है।

ईओयू की हालिया कार्रवाई ने एक बार फिर यह बहस छेड़ दी है कि बिहार में भ्रष्टाचार के खिलाफ सरकार की नीति कितनी प्रभावी है। अब लोगों की नजर इस बात पर टिकी है कि क्या नई सरकार पुराने तौर-तरीकों से अलग कोई सख्त व्यवस्था लागू करेगी या फिर कार्रवाई और पोस्टिंग का वही पुराना सिलसिला चलता रहेगा।

फिलहाल राज्य में भ्रष्टाचार को लेकर राजनीतिक बयानबाजी तेज है, लेकिन आम जनता ठोस परिणाम देखना चाहती है। लोगों का मानना है कि अगर भ्रष्टाचार पर वास्तव में नियंत्रण करना है, तो केवल कार्रवाई दिखाने के बजाय व्यवस्था में स्थायी सुधार लाना होगा। आने वाले समय में यह साफ होगा कि सरकार भ्रष्टाचार के खिलाफ अपने दावों को जमीन पर कितना प्रभावी तरीके से लागू कर पाती है।

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